Middle East Crisis: कश्मीर और लद्दाख में शिया मुसलमानों ने बड़े पैमाने पर शोक प्रदर्शन करने के बाद, ईरान का समर्थन करने के लिए सोना, चांदी और नकद दान करना शुरू कर दिया है. इन दानों का उद्देश्य अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए सैन्य हमलों के बाद देश को हुए नुकसान से उबरने में मदद करना है. लोग सोने और चांदी के गहने, तांबे के बर्तन और नकद, जो भी कीमती चीज उनके पास है, वो दान कर रहे हैं. बूढ़ों से लेकर छोटे बच्चों तक, सभी को इमामबाड़ों, मस्जिदों और दरगाहों में दान करते देखा जा रहा है. इसके अलावा, सड़कों के किनारे भी दान इकट्ठा करने के लिए कई स्टॉल लगाए गए हैं. कुछ बच्चों ने तो अपनी 'ईदी' (त्योहार पर मिलने वाला पैसा) भी दान कर दी है. स्वयंसेवक और मस्जिद प्रबंधन घर-घर जाकर दान इकट्ठा करने का अभियान चला रहे हैं.
बड़े पैमाने पर लोग कर रहे दान
बडगाम से सामने आ रहे इन दृश्यों में देखा जा सकता है कि निवासी संग्रह केंद्रों पर कतार लगाकर खड़े हैं और नकद, सोने-चांदी के गहने, तांबे के बर्तन, घरेलू सामान और यहां तक कि कार और मोटरसाइकिल जैसे वाहन भी दान कर रहे हैं. एक असाधारण एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए, कश्मीर में शिया और कई सुन्नी मुस्लिम समुदायों के सदस्यों ने बड़े पैमाने पर दान अभियान शुरू किए हैं. यह अभियान ईरान के साथ उनके गहरे भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव को दर्शाता है. उनका कहना है कि यह दान मानवता के लिए है और इजरायल और अमेरिका के अत्याचारों के खिलाफ है. हमारे बीच भले ही मतभेद हों, लेकिन इस उद्देश्य के लिए हम सब एक हैं और हम पूरे मुस्लिम समुदाय से एकजुट होने की अपील करते हैं.
इस्लाम के लिए एकजुट हो रहे लोग
दान इकट्ठा कर रहे एक सुन्नी धर्मगुरु, इरफान अली ने कहा, "इमाम खामेनेई हमेशा फिलिस्तीन के साथ खड़े रहे हैं, जहां सुन्नी आबादी रहती है. यह इस्लाम के लिए है. हमारे बीच भले ही मतभेद हों, लेकिन उन मतभेदों को एक तरफ रखकर हमें एकजुट होना होगा. सभी संप्रदायों के लोग दान कर रहे हैं और अब तक लगभग 500 करोड़ रुपये का दान इकट्ठा हो चुका है. यह प्रक्रिया अभी भी जारी है." बच्चों को भी इस प्रयास में शामिल होते देखा जा रहा है. वे समर्थन के एक प्रतीकात्मक संकेत के रूप में अपनी गुल्लकें (पिगी बैंक) सौंप रहे हैं. साथ ही इजरायल और अमेरिका विरोधी नारे लगा रहे हैं और सर्वोच्च नेता तथा इमाम हुसैन (अ.स.) की जय-जयकार कर रहे हैं.
500 करोड़ रुपये जमा किए गए
स्थानीय आयोजकों के अनुसार, दान और वादों की कुल राशि 500 करोड़ रुपये से अधिक हो चुकी है और लोग अभी भी दान कर रहे हैं. यह डोनेशन ड्राइव ईद-उल-फितर के त्योहार के साथ ही शुरू हुई, जिसमें मागम, बडगाम, बारामूला, बांदीपोरा, गांदरबल और श्रीनगर जैसे कई शिया-बहुल इलाकों से लोगों ने हिस्सा लिया. एक शिया डोनर अब्दुल ने कहा, "इस बार हर कोई बिना किसी जाति या धर्म का भेदभाव किए, इंसानियत के लिए एक साथ खड़ा हुआ है और यही इंसानियत के लिए असली समर्थन है." एक डोनर सबीरा ज़ैनब ने कहा, "यह कुछ भी नहीं है, इस पैसे की कोई खास कीमत नहीं है और न ही यह किसी खास संप्रदाय के लिए है. यह तो एकता का एक संदेश है और हम तो ईरान के लिए अपनी जान देने को भी तैयार हैं."
ईरानी एम्बेसी की सराहना
इस नेक पहल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींचा है. भारत स्थित ईरानी एम्बेसी ने इन योगदानों की सराहना करते हुए लोगों का आभार व्यक्त किया है. एक बयान में, एम्बेसी ने कहा कि वह कश्मीर के लोगों द्वारा दिखाई गई "इस दरियादिली को कभी नहीं भूलेगा." आयोजकों का कहना है कि यह पहल एकता का एक सशक्त प्रतीक बन गई है, जिसने दुख और आक्रोश को संघर्ष से प्रभावित लोगों के लिए ठोस मदद में बदल दिया है.
प्रशासन का समर्थन
जम्मू-कश्मीर प्रशासन और केंद्र सरकार ने इस मामले में सावधानीपूर्ण संयम और मानवीय दृष्टिकोण की नीति अपनाई है. प्रशासन ने "डोनेशन (दान) संग्रह पर नियमन, निगरानी और सतर्कता" शीर्षक से एक दस्तावेज जारी किया है. इसके तहत, मस्जिद समितियों और NGO सहित सभी समूहों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि वे पारदर्शिता सुनिश्चित करने हेतु, फंड जुटाने से पहले प्रशासन से अनुमति लें और आवश्यक दस्तावेज जमा करें. भारत सरकार ने भी राहत कार्यों में सीधे तौर पर मदद करने के उद्देश्य से, अपनी पहली चिकित्सा सहायता खेप आधिकारिक तौर पर 'ईरानी रेड क्रिसेंट' को भेजी है.
खामेनेई की मौत के बाद शुरू हुई विरोध प्रदर्शन
ये डोनेशन ड्राइव, 28 फरवरी को हवाई हमलों में अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई की कथित हत्या को लेकर घाटी में हुए पिछले विरोध प्रदर्शनों के बाद शुरू की गई हैं. कश्मीर के कई हिस्सों, खासतौर से शिया-बहुल इलाकों में विरोध प्रदर्शन हुए थे, जो बाद में संगठित मानवीय सहायता प्रयासों में तब्दील हो गए.