पहले ही प्रयास में हासिल की 116वीं रैंक
सीमा की सफलता उनकी मेहनत, अनुशासन और लक्ष्य के प्रति समर्पण का परिणाम है. उन्होंने पहले प्रयास में ही 70वीं बीपीएससी परीक्षा में 116वीं रैंक हासिल की. एक साधारण ग्रामीण परिवार से निकलकर पुलिस सेवा में अधिकारी बनने तक का उनका सफर क्षेत्र की अन्य युवतियों के लिए भी प्रेरणा बन गया है. फिलहाल राजगीर में उनका प्रशिक्षण चल रहा है.
पिता की छोटी दुकान, लेकिन बच्चों की पढ़ाई को दी प्राथमिकता
सीमा के पिता परमेश्वर साह गांव में कपड़े की छोटी दुकान चलाते हैं. सीमित आमदनी के बावजूद उन्होंने और उनकी पत्नी शीला देवी ने बच्चों की शिक्षा में कोई कमी नहीं आने दी. माता-पिता ने बेटे और बेटी की पढ़ाई को बराबर महत्व दिया और सीमा को अपने सपने पूरे करने के लिए पूरा सहयोग दिया. पिता परमेश्वर साह के लिए यह उपलब्धि गर्व का पल है. उनका कहना है कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उनकी बेटी पुलिस की वर्दी पहनकर जिले का नाम रोशन करेगी.
गांव के स्कूल से नवोदय और फिर दिल्ली तक का सफर
सीमा की शुरुआती पढ़ाई गांव के स्कूल में हुई. अपनी प्रतिभा के दम पर उन्होंने जवाहर नवोदय विद्यालय में दाखिला पाया और वहीं से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद दरभंगा से स्नातक की डिग्री हासिल की. सिविल सेवा में जाने का लक्ष्य तय करने के बाद वह तैयारी के लिए दिल्ली चली गईं. वहां निरंतर मेहनत और एकाग्रता के साथ तैयारी की, जिसका परिणाम पहले ही प्रयास में मिली इस सफलता के रूप में सामने आया.
ग्रामीण बेटियों के लिए बनीं प्रेरणा
सीमा की उपलब्धि ने यह संदेश दिया है कि अवसर और परिवार का सहयोग मिलने पर ग्रामीण परिवेश की बेटियां भी बड़े लक्ष्य हासिल कर सकती हैं. उनकी सफलता उन परिवारों के लिए प्रेरणा है, जहां बेटियों की उच्च शिक्षा और करियर को लेकर अब भी संकीर्ण सोच मौजूद है. सीमा की कहानी बताती है कि आर्थिक सीमाएं और ग्रामीण परिवेश किसी की मंजिल तय नहीं करते. मेहनत, आत्मविश्वास और परिवार का साथ सफलता की राह खोल सकते हैं.