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Sunday, August 16, 2026

पूर्णिया के बाड़ीहाट में माता लक्ष्मी का ऐतिहासिक मंदिर: 1948 से चली आ रही परंपरा, विसर्जन से पहले होती है ‘सिंदूर की होली’

पूर्णिया के बाड़ीहाट में माता लक्ष्मी का ऐतिहासिक मंदिर: 1948 से चली आ रही परंपरा, विसर्जन से पहले होती है ‘सिंदूर की होली’

पूर्णिया। शहर के बाड़ीहाट में स्थित माता लक्ष्मी का ऐतिहासिक मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र है। धन, सुख और समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी को समर्पित इस मंदिर को लोग केवल धार्मिक और आध्यात्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि पूर्णिया शहर की खुशहाली और विकास का प्रतीक भी मानते हैं। हर साल लक्ष्मी पूजा के दौरान यहां पांच दिनों तक आस्था, भक्ति और मेले का भव्य नजारा देखने को मिलता है।

इस मंदिर की सबसे खास परंपराओं में विसर्जन से पहले महिलाओं द्वारा खेली जाने वाली ‘सिंदूर की होली’ शामिल है। इस अनूठी रस्म को देखने के लिए शहर और आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाड़ीहाट पहुंचते हैं।

विसर्जन से पहले महिलाओं की ‘सिंदूर की होली’

लक्ष्मी पूजा के समापन के बाद जब मां लक्ष्मी की प्रतिमा के विसर्जन की तैयारी होती है, उससे पहले मंदिर परिसर में महिलाओं की विशेष पूजा होती है। विवाहित महिलाएं पूरे विधि-विधान के साथ माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करती हैं।

महिलाएं सबसे पहले मां लक्ष्मी के चरणों से लेकर माथे तक सिंदूर अर्पित करती हैं। इसके बाद एक-दूसरे के माथे और गालों पर सिंदूर लगाकर ‘सिंदूर की होली’ खेलती हैं। इस दौरान पूरा मंदिर परिसर भक्ति, उल्लास और भावनाओं से भर जाता है।

मान्यता है कि इस परंपरा के माध्यम से महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, परिवार की सुख-शांति और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। सिंदूर की होली के बाद महिलाएं भावुक होकर मां लक्ष्मी को अगले वर्ष फिर आने का निमंत्रण देती हैं और नम आंखों से उनकी विदाई करती हैं।

आजादी के बाद 1948 में रखी गई थी पूजा की नींव

बाड़ीहाट में लक्ष्मी पूजा की परंपरा करीब आठ दशक पुरानी है। देश की आजादी के एक वर्ष बाद 1948 में यहां भव्य लक्ष्मी पूजा की शुरुआत की गई थी।

पूजा की नींव रखने वालों में स्व. नूनू सिंह, स्व. लक्ष्मी नारायण सिंह, शिवनाथ सिंह और रुपलाल पांडेय सहित क्षेत्र के कई प्रबुद्ध नागरिक शामिल थे। उस समय शुरू हुई यह धार्मिक परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और भव्यता के साथ जारी है।

स्थापना से जुड़े कई लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा शुरू की गई पूजा आज भी नई पीढ़ी को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ रही है।

पांच दिनों तक भक्ति और मेले का रहता है माहौल

बाड़ीहाट में लक्ष्मी पूजा के दौरान पांच दिनों तक पूरा इलाका उत्सव के रंग में रंग जाता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां लक्ष्मी के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए यहां पहुंचते हैं। इन दिनों मंदिर परिसर और आसपास का क्षेत्र शहर के प्रमुख आकर्षणों में शामिल रहता है।

मेले में ग्रामीण और शहरी संस्कृति का संगम

पूजा के साथ लगने वाला भव्य मेला भी लोगों के आकर्षण का बड़ा केंद्र होता है। मेले में ग्रामीण संस्कृति की सादगी के साथ आधुनिक मनोरंजन और खरीदारी के कई विकल्प देखने को मिलते हैं।

बच्चों के लिए तरह-तरह के मनोरंजन के साधन, खिलौनों की दुकानें और मीना बाजार मेले की रौनक बढ़ाते हैं। परिवार के साथ पहुंचने वाले लोग पूजा के साथ खरीदारी और मनोरंजन का भी आनंद लेते हैं।

बाड़ीहाट का लक्ष्मी मंदिर आज भी पूर्णिया की धार्मिक आस्था, सामाजिक एकजुटता और वर्षों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा का जीवंत प्रतीक बना हुआ है।