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Friday, June 19, 2026

BIHAR:कंधों पर बैठकर दुल्हन के घर पहुंचा दूल्हा, किशनगंज के अधूरे पुल ने फिर खोली विकास की पोल

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कंधों पर बैठकर दुल्हन के घर पहुंचा दूल्हा, किशनगंज के अधूरे पुल ने फिर खोली विकास की पोल

किशनगंज: बिहार के किशनगंज जिले से विकास के दावों की हकीकत बयां करती एक तस्वीर सामने आई है। यहां एक बारात को दुल्हन के घर पहुंचने के लिए नाव और ग्रामीणों के कंधों का सहारा लेना पड़ा। मामला ठाकुरगंज प्रखंड के दल्लेगांव पंचायत का है, जहां अधूरे पुल और एप्रोच सड़क की कमी ने शादी जैसे खुशियों भरे मौके को संघर्ष में बदल दिया।

दिगली से दल्लेगांव पहुंची बारात मेची नदी के किनारे आकर रुक गई। सामने करोड़ों की लागत से बना पुल खड़ा था, लेकिन उस तक पहुंचने के लिए सड़क ही नहीं थी। वाहन आगे नहीं बढ़ सके। दुल्हन का घर सामने होने के बावजूद रास्ता पूरी तरह दुर्गम था।

ऐसे में ग्रामीणों ने जिम्मेदारी संभाली। पहले दूल्हे को नाव से नदी का हिस्सा पार कराया गया। इसके बाद कीचड़ और खराब रास्ते के कारण लोगों ने दूल्हे को अपने कंधों पर बैठाकर विवाह स्थल तक पहुंचाया। सिर पर सेहरा और चेहरे पर मुस्कान लिए दूल्हा कंधों पर बैठकर अपनी मंजिल तक पहुंचा। यह दृश्य वहां मौजूद लोगों को भावुक कर गया।

ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2019 में मुख्यमंत्री ग्रामीण विकास योजना के तहत मेची नदी पर करीब 24 करोड़ रुपये की लागत से पुल निर्माण शुरू हुआ था। वर्ष 2020 में सुखानी से दल्लेगांव तक सड़क भी बनी, लेकिन भूमि विवाद के कारण एप्रोच पथ का निर्माण अधूरा रह गया। इसी बीच नदी ने धारा बदल ली, जिससे पुल का उपयोग लगभग असंभव हो गया।

अधूरे पुल का असर सिर्फ एक गांव तक सीमित नहीं है। दल्लेगांव, भवानीगंज, बैगनबाड़ी, तेलीभीट्टा और पाठामारी समेत कई गांवों के हजारों लोग रोजाना परेशानी झेल रहे हैं। मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में दिक्कत होती है, जबकि स्कूली बच्चों को जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ती है। बरसात में हालात और गंभीर हो जाते हैं।

लगातार उपेक्षा से परेशान होकर पंचायत की मुखिया सोगरा नाहिद ने पटना हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार से जवाब मांगा और अधूरे निर्माण को जल्द पूरा करने का निर्देश दिया।

हालांकि दूल्हे की बारात आखिरकार अपनी मंजिल तक पहुंच गई और शादी संपन्न हो गई, लेकिन यह घटना एक बड़ा सवाल छोड़ गई—आखिर कब तक लोग नाव, कंधों और जोखिम भरे रास्तों के सहारे जिंदगी गुजारने को मजबूर रहेंगे?