ग्रामीणों ने किया पुलिस का विरोध
हैरानी की बात तो यह है कि सूचना मिलते ही आजमनगर पुलिस मौके पर पहुंची तो सही, लेकिन ‘खाकी’ का इकबाल यहां फीका नजर आया. बताया जा रहा है कि ग्रामीणों के भारी विरोध और ‘पंचायती’ के रसूख के आगे पुलिस को बैरंग वापस लौटना पड़ा. फिलहाल धूमनगर में पंचायत बैठाई गई है, जहां तुगलकी फरमानों और आपसी सुलह के बीच कानून सिसकता नजर आ रहा है.
किताबों में लिखा था कि ‘हया ही आधा ईमान है, मगर यहां तो उस्ताद ही मजहब से अनजान है. मदरसे की चहारदीवारी में जो देते थे, नेक रास्ते की सीख, आज वही इश्क की गलियों में मांग रहे हैं जलील होकर भीख. खाकी खामोश खड़ी है और पंचायत का पहरा है, गुनाह गहरा है उस्ताद और दाग भी बहुत गहरा है.’
क्या एक सरकारी शिक्षक को इस तरह सरेआम प्रताड़ित करना सही है? और उससे भी बड़ा सवाल यह कि क्या पुलिस को पंचायती के भरोसे ऐसे संगीन मामलों को छोड़ देना चाहिए? क्या मदरसा जैसे संस्थानों में नैतिकता का पाठ पढ़ाने वालों की जांच अब सड़कों पर होगी.