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Thursday, November 5, 2026

NEWS DESK:जनकवि बाबा नागार्जुन की पुण्यतिथि पर विशेष संस्मरण: भागलपुर की कचड़ी-फुलौरी की दुकान पर गूंजा था ‘इन्दु जी, इन्दु जी...’, युवा पत्रकार अरविन्द वर्मा के साथ बिताए ऐतिहासिक पल हुए याद

जनकवि बाबा नागार्जुन की पुण्यतिथि पर विशेष संस्मरण: भागलपुर की कचड़ी-फुलौरी की दुकान पर गूंजा था ‘इन्दु जी, इन्दु जी...’, युवा पत्रकार अरविन्द वर्मा के साथ बिताए ऐतिहासिक पल हुए याद

खगड़िया। जनकवि बाबा नागार्जुन की पुण्यतिथि पर उनका साहित्यिक जीवन, बेबाक अंदाज और जनता से जुड़ाव एक बार फिर याद किया जा रहा है। इसी कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार डॉ. अरविन्द वर्मा ने बाबा नागार्जुन के साथ बिताए अपने पुराने दिनों का एक दिलचस्प और ऐतिहासिक संस्मरण साझा किया है। यह वह दौर था, जब बाबा नागार्जुन भागलपुर आए थे और युवा पत्रकार अरविन्द वर्मा को उनके साथ कुछ यादगार पल बिताने का अवसर मिला था।

भागलपुर स्टेशन के पास गेलार्ड होटल में ठहरे थे बाबा

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. अरविन्द वर्मा बताते हैं कि जब बाबा नागार्जुन भागलपुर आए थे, तब उनके ठहरने की व्यवस्था भागलपुर रेलवे स्टेशन के पास स्थित गेलार्ड होटल में की गई थी। होटल में साहित्यकारों, पत्रकारों और आम लोगों का लगातार आना-जाना लगा रहता था। हर कोई बाबा से मिलना चाहता था और उनकी बातें सुनने के लिए उत्सुक रहता था।

हालांकि, कुछ देर होटल में रहने के बाद ही बाबा ने कहा, "यहां मेरा दम घुट रहा है, चलो बाजार घूमते हैं।"

बाबा नागार्जुन को बंद कमरों में रहना और बड़े-बड़े स्वागत समारोह पसंद नहीं थे। वे हमेशा आम लोगों के बीच रहना पसंद करते थे। उनके लिए साहित्य और कविता का वास्तविक संसार जनता के बीच ही था।

बाबा के साथ बाजार घूमने निकले साहित्यकार और पत्रकार

इसके बाद युवा पत्रकार अरविन्द वर्मा के साथ हास्य कवि स्व. रामावतार राही, पारस कुंज और दिवाकर विद्रोही भी बाबा नागार्जुन के साथ बाजार घूमने निकल पड़े।

बाजार में घूमते हुए बाबा दुकानदारों से बातचीत करते, लोगों का हालचाल पूछते और बीच-बीच में ठहाके लगाते रहे। उनके व्यक्तित्व में ऐसी सहजता थी कि कोई भी व्यक्ति उनसे आसानी से जुड़ जाता था।

इसी दौरान उनकी नजर एक कचड़ी-फुलौरी की दुकान पर पड़ी। वहां आम लोग बैठकर नाश्ता कर रहे थे। बाबा ने दुकान देखते ही कहा, "चलो हमलोग भी यहीं नाश्ता करते हैं।"

इसके बाद सभी लोग दुकान पर बैठ गए। कचड़ी-फुलौरी और चाय मंगाई गई। दुकान पर मौजूद लोग शुरुआत में उन्हें पहचान नहीं पाए, लेकिन बाबा ने जैसे ही बातचीत शुरू की, सभी उनकी ओर आकर्षित होने लगे।

कचड़ी-फुलौरी की दुकान पर गूंज उठी ‘इन्दु जी, इन्दु जी...’

नाश्ते के दौरान बातचीत साहित्य से होते हुए देश की राजनीति तक पहुंच गई। आपातकाल और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की चर्चा शुरू हुई तो बाबा नागार्जुन का अंदाज पूरी तरह बदल गया। उनकी आंखों में वही तेवर दिखाई देने लगा, जिसके लिए वे सत्ता के खिलाफ अपनी बेबाक कविताओं के माध्यम से पहचाने जाते थे।

फिर क्या था, आम लोगों के बीच कचड़ी-फुलौरी की उसी छोटी-सी दुकान पर बाबा ने अपनी चर्चित राजनीतिक व्यंग्य कविता सुनानी शुरू कर दी।

"इन्दु जी, इन्दु जी क्या हुआ आपको, सत्ता की मस्ती में भूल गई बाप को। बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को, क्या हुआ आपको?"

बाबा की इन पंक्तियों में तत्कालीन सत्ता और राजनीतिक परिस्थितियों पर तीखा व्यंग्य था। वहां मौजूद लोग चुपचाप उनकी कविता सुनते रहे। यह किसी मंच का कार्यक्रम नहीं था, न ही कोई साहित्यिक समारोह। आम लोगों के बीच एक जनकवि अपनी बेबाक आवाज में सत्ता से सवाल कर रहा था।

कविता सुनाने के बाद बाबा हंस पड़े और बोले, "पत्रकार, जनकवि हूं, साफ कहूंगा, क्यों हकलाऊं।"

उनका यह अंदाज वहां मौजूद लोगों के लिए अविस्मरणीय बन गया।

रामावतार राही ने भी बांधा था समां

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान हास्य कवि स्व. रामावतार राही अपनी चटपटी और हास्यपूर्ण पंक्तियों से माहौल को हल्का करते रहे। वहीं पारस कुंज और दिवाकर विद्रोही ने भागलपुर की संस्कृति, साहित्य और लोकभाषा पर बाबा के साथ चर्चा की।

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. अरविन्द वर्मा बताते हैं कि बाबा नागार्जुन बेहद सरल, सहज और स्पष्टवादी व्यक्तित्व के धनी थे। वे हर किसी से खुलकर बात करते थे और युवा पत्रकारों को हमेशा प्रोत्साहित करते थे। उनकी सीख थी कि पत्रकारिता में सच लिखना चाहिए और जनता की आवाज बनना चाहिए।

आज भी आंखों के सामने जीवंत हैं वे यादगार पल

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. अरविन्द वर्मा (प्रधान संपादक, वैशाली इलेक्ट्रॉनिक हिन्दी) का कहना है कि बाबा नागार्जुन का साहित्य और उनका संघर्षशील जीवन आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है।

वे बताते हैं, "उस दिन स्टेशन के पास गेलार्ड होटल में बाबा के ठहरने से लेकर बाजार की सैर और कचड़ी-फुलौरी की दुकान पर उनके साथ बिताए पल आज भी आंखों के सामने जीवंत हैं। बाबा जैसे रचनाकारों की सोच और उनकी बेबाक अभिव्यक्ति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।"

जनता के बीच रहकर जनता की बात कहने वाले बाबा नागार्जुन ने अपनी लेखनी से हमेशा अन्याय, शोषण और सत्ता के अहंकार पर प्रहार किया। उनकी कविताएं केवल साहित्य नहीं, बल्कि समाज और राजनीति का आईना भी हैं।

जनकवि बाबा नागार्जुन की पुण्यतिथि पर उनके संघर्ष, साहित्य, विचारों और बेबाक व्यक्तित्व को शत-शत नमन।