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Sunday, August 16, 2026

न संतान, न सहारा... पड़ोसियों ने निभाया औलाद का फर्ज, 85 साल की रामकुमारी को पालकी में 105 KM बाबा धाम ले चले

न संतान, न सहारा... पड़ोसियों ने निभाया औलाद का फर्ज, 85 साल की रामकुमारी को पालकी में 105 KM बाबा धाम ले चले

मुंगेर। सावन की आस्था के बीच इंसानियत की एक बेहद भावुक तस्वीर सामने आई है। 85 वर्षीय रामकुमारी देवी की बाबा बैद्यनाथ धाम जाने की इच्छा थी, लेकिन उम्र और पैरों की परेशानी के कारण उनके लिए करीब 105 किलोमीटर की यात्रा पैदल करना संभव नहीं था। रामकुमारी की कोई संतान नहीं है और उनके पति भी उम्रदराज हैं।

ऐसे में पड़ोसियों ने उनका सहारा बनने का फैसला किया। मुजफ्फरपुर की रहने वाली राधा देवी और उनके पति समेत चार पड़ोसी रामकुमारी को पालकी में बैठाकर सुल्तानगंज से बाबा बैद्यनाथ धाम की यात्रा पर निकल पड़े।

कहा- 'हम आपके बच्चे बनकर बाबा धाम ले जाएंगे'

रामकुमारी लंबे समय से बाबा बैद्यनाथ के दर्शन करना चाहती थीं। सावन में उनकी इच्छा और भी बढ़ गई। लेकिन जब उन्होंने अपनी परेशानी पड़ोसियों से साझा करते हुए कहा कि अगर उनका बेटा होता तो शायद वह उन्हें बाबा धाम ले जाता, तो राधा देवी भावुक हो गईं।

राधा देवी ने उन्हें भरोसा देते हुए कहा, "दादी, आप चिंता मत कीजिए, हम आपके बच्चे बनकर आपको बाबा धाम लेकर जाएंगे।"

इसके बाद पड़ोसियों ने उनकी इच्छा पूरी करने का बीड़ा उठा लिया।

2 हजार रुपये में बनाई बांस-खटिया की पालकी

रामकुमारी के लिए करीब 2 हजार रुपये खर्च कर बांस और खटिया से पालकी तैयार की गई। इसमें उन्हें बैठाकर चारों पड़ोसी बारी-बारी से कंधे पर उठाकर यात्रा कर रहे हैं।

दो पुरुष और दो महिलाएं मिलकर पालकी संभाल रहे हैं। सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर यह जत्था बाबा बैद्यनाथ धाम की ओर बढ़ रहा है।

पहले दादी की मनोकामना, फिर अपनी यात्रा

जत्थे में शामिल लोगों का कहना है कि उनके लिए सबसे पहले रामकुमारी की मनोकामना पूरी करना जरूरी है। किरण देवी ने कहा कि पहले दादी को बाबा बैद्यनाथ के दर्शन कराए जाएंगे, उसके बाद वे अपनी यात्रा पूरी करेंगे। जरूरत पड़ी तो सावन के बाद भादो में भी यात्रा पूरी की जाएगी।

वहीं मनोज साहनी ने कहा कि आज के समय में कई लोग अपने माता-पिता तक को तीर्थ दर्शन नहीं करा पाते। ऐसे में जब पड़ोस की बुजुर्ग महिला का कोई सहारा नहीं था तो उन्होंने सोचा कि क्यों न बेटा बनकर उनकी इच्छा पूरी की जाए।

पालकी में बैठी दादी की आंखों में दिखी खुशी

लंबी यात्रा के दौरान कभी एक पड़ोसी पालकी उठाता तो कुछ दूरी के बाद दूसरा कंधा संभाल लेता। पालकी में बैठी रामकुमारी की आंखों में बाबा बैद्यनाथ के दर्शन की उम्मीद और चेहरे पर खुशी साफ दिखाई दे रही है।

रामकुमारी का कहना है कि वह बाबा भोलेनाथ के दर्शन के लिए जा रही हैं और उन्हें इस बात की बेहद खुशी है।

खून का रिश्ता नहीं, फिर भी औलाद से बढ़कर निभाया फर्ज

रामकुमारी और राधा देवी का कोई खून का रिश्ता नहीं है। दोनों पड़ोसी हैं, लेकिन जरूरत के समय राधा देवी और उनके परिवार ने जिस तरह बुजुर्ग महिला का साथ दिया, वह इंसानियत की मिसाल बन गया है।

बांस और खटिया से बनी यह पालकी सिर्फ एक बुजुर्ग महिला को बाबा धाम पहुंचाने का साधन नहीं, बल्कि उस भरोसे की तस्वीर है कि जरूरत पड़ने पर कोई अपना बनकर साथ खड़ा हो सकता है।

रामकुमारी की मंजिल बाबा बैद्यनाथ का दरबार है, लेकिन उनकी इस यात्रा ने रास्ते में ही एक बड़ा संदेश दे दिया—औलाद होना सिर्फ खून का रिश्ता होना नहीं, बल्कि जरूरत के वक्त किसी का हाथ थामना भी है।