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Friday, November 28, 2025

SPECIAL REPORT:विवशता और फरेब के बीच पल रही गुलामी — देह व्यापार में धकेली जा रहीं नाबालिग बच्चियां

सीमांचल की काली सच्चाई:
विवशता और फरेब के बीच पल रही गुलामी — देह व्यापार में धकेली जा रहीं नाबालिग बच्चियां

पूर्णिया। नेपाल और बांग्लादेश से सटे बिहार के सीमांचल क्षेत्र में मासूमियत की सबसे भयावह कीमत चुकाई जा रही है। यहां दासता की नयी कहानियां जन्म ले रही हैं, जिनमें नाबालिग बच्चे और बच्चियां सबसे ज्यादा शिकार बन रहे हैं। गरीबी, जागरुकता की कमी और लालच के चलते यहां बाल श्रम, ट्रैफिकिंग और देह व्यापार की काली दुनिया फल-फूल रही है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूर्णिया, कटिहार, अररिया और किशनगंज — इन चार जिलों में हर माह औसतन 20 नाबालिगों को बाल श्रम से मुक्त कराया जाता है। कई मामलों में परिवार आर्थिक संकट के कारण बच्चों को दुकानों, मखाना फोड़ी जैसे कामों में गिरवी रख देते हैं। मखाना उद्योग तो काफी हद तक बच्चों के श्रम पर टिका बताया जाता है।

इंटरनेट बना नया जाल

अब ट्रैफिकिंग के तरीके और आधुनिक हो गए हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया की मदद से नाबालिग लड़कियों को प्रेम संबंध और शादी का झांसा देकर देह मंडियों में धकेलने का सिलसिला तेजी से बढ़ रहा है।
चंद माह पहले ही पूर्णिया की दो देह मंडियों से 15 बच्चियों को मुक्त कराया गया था। इसी तरह फर्जी शादी के जरिए बच्चियों की तस्करी के मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं।

भूमिका विहार संस्था की निदेशक शिल्पी सिंह कहती हैं—
“ट्रैफिकिंग के नये-नये तरीके सामने आ रहे हैं। हमारे पास ऐसे कई मामलों के आंकड़े मौजूद हैं।”

सरकार की पहल — पर तस्वीर अब भी भयावह

सामाजिक कल्याण विभाग, बाल कल्याण समिति और बाल संरक्षण इकाई के माध्यम से बचाए गए बच्चों के पुनर्वास की प्रक्रिया जारी है।
फिलहाल 306 बच्चों को, जो माता-पिता के अभाव या मजबूरी में मजदूरी कर रहे थे, मुक्त कराकर ₹4,000 प्रतिमाह सहायतार्थ दिया जा रहा है। वहीं देह व्यापार से छुड़ाई गई नाबालिग बच्चियों को आवासन, विधिक सहायता और काउंसिलिंग उपलब्ध कराई जा रही है ताकि वे नई जिंदगी जी सकें।

बाल कल्याण समिति, पूर्णिया के चेयरपर्सन सुमित प्रकाश कहते हैं—
“सरकारी स्तर पर बेहतर प्रयास हो रहे हैं, लेकिन ये लड़ाई अभी लंबी है। जब तक समाज साथ नहीं देगा, गुलामी की ये सच्चाई बदस्तूर जारी रहेगी।”


सीमांचल के इस कड़वे सच में एक तरफ गरीबी की विवशता है, तो दूसरी तरफ मानवता को शर्मसार करता फरेब। सवाल यह है कि कब तक मासूमियत यूं बाजारों में बिकती रहेगी?