मधेपुरा जिले के उदाकिशुनगंज प्रखंड के स्थित मुरली चंदवा गांव में मां सरस्वती मंदिर की स्थापना सन 1929 में हुआ तथा इस मंदिर का नवनिर्माण सन 1985 ईस्वी में किया गया!
यह बहुत प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर उदाकिशुनगंज प्रखंड का प्रसिद्ध मंदिर है! वैसे तो यहां सालों भर श्रद्धालु आते रहते हैं, खासकर शारदीय वसंत पंचमी के समय यहां धूमधाम से पूजा अर्चना की जाती है! मंदिर की सजावट, पूजा- पंडाल, लाइट- साउंड इत्यादि की विशेष व्यवस्था रहती है! मेला के समय गांव में भयंकर जाम लग जाती है! सड़क के दोनों बगल तरह- तरह के दुकान सजी रहती हैं, जिसमें जिससे मेला की सुंदरता में चार चांद लग जाता है!
मां सरस्वती मंदिर पूजा समिति के जितने भी सदस्य हैं, वे ईमानदार और काफी सक्रिय हैं! मेला को सफल बनाने में समिति सदस्य का काफी योगदान रहता है! इसलिए मां सरस्वती मंदिर पूजा कमेटी गांव की सबसे मजबूत कमेटी में मशहूर है!
माता के प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा के रात्रि में दिया जाता है। गांव मे मां सरस्वती पूजा को लेकर बडे आयोजन होने जा रहे हैं । इस आयोजन में बाहर से बडे-बडे कलाकार सहित हरियाणा-पंजाब सहित अन्य प्रदेशों से कुश्ती में भाग लेने पहलवान आ रहे हैं । यह आयोजन 3 एवं 4 फरवरी को होने जा रहा है । गांव के पूजा समिति के लोगों ने बताया कि मां सरस्वती पूजा समिति की ओर से यहां सरस्ती पूजा में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी बड़े धूमधाम से मनाया जाएगा ।
मां सरस्वती युवक नाट्य कला परिषद की और से पूजा के अवसर पर दो दिवसीय भव्य सांस्कृतिक समारोह का आयोजन होने जा रहा है ।
इसमें दोनों दिन बाहर के कलाकार द्वारा मंचन कर अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे । ठीक इसी तरह दोनों दिन दंगल का आयोजन होगा, जिसमें हरियाणा, पंजाब आदि प्रदेशों से आनेवाले बडे-बडे पहलवान अपनी पहलवानी दिखाएंगे । इसके अलावा मेला में अनेक मनोरंजन के साधन रहेंगे । उन्होंने सभी लोगों से अपील की कि वे दोनों दिन यहां आकर कलाकारों एवं पहलवानों का मनोबल बढाएं ।
यह बहुत प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर उदाकिशुनगंज प्रखंड का प्रसिद्ध मंदिर है! वैसे तो यहां सालों भर श्रद्धालु आते रहते हैं, खासकर शारदीय वसंत पंचमी के समय यहां धूमधाम से पूजा अर्चना की जाती है! मंदिर की सजावट, पूजा- पंडाल, लाइट- साउंड इत्यादि की विशेष व्यवस्था रहती है! मेला के समय गांव में भयंकर जाम लग जाती है! सड़क के दोनों बगल तरह- तरह के दुकान सजी रहती हैं, जिसमें जिससे मेला की सुंदरता में चार चांद लग जाता है!
मां सरस्वती मंदिर पूजा समिति के जितने भी सदस्य हैं, वे ईमानदार और काफी सक्रिय हैं! मेला को सफल बनाने में समिति सदस्य का काफी योगदान रहता है! इसलिए मां सरस्वती मंदिर पूजा कमेटी गांव की सबसे मजबूत कमेटी में मशहूर है!
माता के प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा के रात्रि में दिया जाता है। धरती पर जब पीले फूलों की चादर बिछने लगती है, जब मंद-मंद हवा मन में उत्साह का संचार करती है, और ज जब सूरज की किरणें मानो जीवन को नवजीवन का संदेश देती हैं, तब समझिए वसंत ऋतु ने अपनी दस्तक दे दी है। यह केवल ऋतु का परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रकृति का एक अद्भुत उत्सव है, जो हृदय को भी उसी आनंद और उल्लास से भर देता है। इसी उल्लास को जीवन में संजोने का एक विशेष दिन है- वसंत पंचमी। यह वह दिन है, जब विद्या और वाणी की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। वृंदावन में इसी दिन से होली के रंगों की शुरुआत होती है। यह दिन केवल ऋतु परिवर्तन का नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में नवचेतना और रचनात्मकता का प्रतीक है। शिक्षक, कलाकार, संगीतकार- ये सभी इस दिन देवी सरस्वती के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं, क्योंकि यह सृजन का महापर्व है।
आपने भी देवी सरस्वती की मूर्ति या चित्र देखा होगा। उसमें मां सरस्वती श्वेत कमल पर बैठी हुई हैं। कहीं-कहीं उनको हंस पर बैठे हुए दिखाया जाता है। उनका सुंदर मुख है, श्वेत वस्त्र हैं, चार भुजाएं हैं। सामने दो हाथों में वीणा, पीछे एक हाथ में माला और एक हाथ में ग्रंथ को धारण किए हुए दिखाया जाता है।
धरती पर जब पीले फूलों की चादर बिछने लगती है, जब मंद-मंद हवा मन में उत्साह का संचार करती है, और ज जब सूरज की किरणें मानो जीवन को नवजीवन का संदेश देती हैं, तब समझिए वसंत ऋतु ने अपनी दस्तक दे दी है। यह केवल ऋतु का परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रकृति का एक अद्भुत उत्सव है, जो हृदय को भी उसी आनंद और उल्लास से भर देता है। इसी उल्लास को जीवन में संजोने का एक विशेष दिन है- वसंत पंचमी। यह वह दिन है, जब विद्या और वाणी की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। वृंदावन में इसी दिन से होली के रंगों की शुरुआत होती है। यह दिन केवल ऋतु परिवर्तन का नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में नवचेतना और रचनात्मकता का प्रतीक है। शिक्षक, कलाकार, संगीतकार- ये सभी इस दिन देवी सरस्वती के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं, क्योंकि यह सृजन का महापर्व है।
आपने भी देवी सरस्वती की मूर्ति या चित्र देखा होगा। उसमें मां सरस्वती श्वेत कमल पर बैठी हुई हैं। कहीं-कहीं उनको हंस पर बैठे हुए दिखाया जाता है। उनका सुंदर मुख है, श्वेत वस्त्र हैं, चार भुजाएं हैं। सामने दो हाथों में वीणा, पीछे एक हाथ में माला और एक हाथ में ग्रंथ को धारण किए हुए दिखाया जाता है।
