पूर्व डीजीपी ने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला किसी भी तरह से असली पुलिस मुठभेड़ का नहीं, बल्कि सीधे-सीधे हत्या का प्रतीत होता है. उन्होंने भरत भूषण की पृष्ठभूमि पर बात करते हुए स्पष्ट किया कि वह कोई चोर, डाकू, लुटेरा, आतंकवादी या नक्सलवादी नहीं था, बल्कि एक बीएससी पास युवक था जो जवईनिया गांव के विस्थापितों और बाढ़ पीड़ितों की समस्याओं के लिए सोशल मीडिया पर लगातार आवाज उठा रहा था.
'पुलिस या व्यवस्था को गाली देना…'
पूर्व डीजीपी के अनुसार व्यवस्था और प्रशासन की लापरवाही के खिलाफ लड़ते-लड़ते वह हताशा में आकर मानसिक रूप से थोड़ा असंतुलित और दीवाना हो गया था, लेकिन पुलिस या व्यवस्था को गाली देना इतना बड़ा अपराध कभी नहीं हो सकता कि किसी को गोली ही मार दी जाए.
गुप्तेश्वर पांडेय ने कहा कि वीडियो में साफ दिख रहा है कि भरत भूषण और पुलिस बल के बीच की दूरी लगभग 200 मीटर से भी ज्यादा थी, चूंकि एक साधारण पिस्तौल की मारक क्षमता अधिकतम 30 मीटर तक होती है, इसलिए इतनी दूरी पर खड़ी और अत्याधुनिक हथियारों से लैस पुलिस टीम को उससे कोई वास्तविक खतरा था ही नहीं. युवक हथियार फेंक दिया था और वह आत्मसमर्पण कर चुका था, ऐसे में निहत्थे हो चुके व्यक्ति पर गोलियों की बौछार करना पुलिस की कार्यप्रणाली पर गहरा दाग लगाता है.
पुलिस द्वारा जारी विज्ञप्ति में उसे 'विक्षिप्त' बताए जाने पर भी उन्होंने तंज कसा कि अगर वह मानसिक रूप से बीमार था, तो प्रशासन को यह साबित करना होगा कि उसका इलाज कहां चल रहा था.
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पूर्व डीजीपी ने राज्य सरकार की कार्रवाई को नाकाफी बताते हुए कहा कि केवल चार पुलिसकर्मियों को निलंबित कर देने से न्याय नहीं होगा. जब सरकार कहती है कि कोई अपराधी बचेगा नहीं, तो यह नियम वर्दीधारी अपराधियों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए.
'एफआईआर हो… गिरफ्तार किया जाए'
उन्होंने मांग की है कि इस घटना में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ तुरंत हत्या की एफआईआर दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया जाए और नौकरी से बर्खास्त किया जाए. इसके साथ ही इस पूरे मामले की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए उच्च न्यायालय के किसी माननीय न्यायाधीश की निगरानी में एसआईटी जांच कराई जाए और स्पीडी ट्रायल के जरिए दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए.