छठ पूजा की महानता हमारे बिहार में अद्भुत है
मधेपुरा :- युवा पत्रकार रामानंद कुमार बताते हैं की छठ सामूहिकता का महापर्व है इसका नाम धर्म पूजा विधि सब आस्था पर आधारित है इस पर्व में समाज के सभी तबको की जरूरत पड़ती है कोई दूध लाता है तो कोई दऊरा कोई आम की लकड़ी लाता है तो कोई मिट्टी का चूल्हा इस पर्व में ना कोई राजा होता है ना कोई रंग सभी एक समान होते हैं। नाक से सिर तक सिंदूर लगाए महिलाओं को देखते ही उनके चरणों में गिरकर आशीर्वाद लेने के लिए मन व्याकुल हो जाता है। प्रकृति पूजा का ऐसा अनुष्ठान पूरे विश्व में कहीं नहीं होता छठ सीखाता है कि जिसका अस्त होता है उसका उदय निश्चित है। इस महापर्व में जो कुछ भी लोगों के पास उपलब्ध है उसी से पूजा अनुष्ठान हो जाता है। गुड आटा घी का ठेकुआ गागल नींबू नारियल केला अरुई सुथन्नी शरीफा नींबू मूली अदरक हल्दी बोडो गन्ना और उपलब्ध सभी ऋतु फल सेव संतरा नाशपाती अनार अमरूद अनारस पानी फल सिंघाड़ा सब छठी मैया को समर्पित होता है 48 घंटे का निर्जला उपवास एक बड़ी अद्भुत आत्मिक शक्ति देती है प्रकृति की पूजा का विधान इससे बढ़िया कुछ हो ही नहीं सकता। आप छठ के समय बिहार चले आइए फिर आपको समझ में आएगा कि बिहार कैसे बदल गया है हर कोई हर दूसरे के सहयोग में लगा है मधेपुरा के भिरखी छठ घाट हो या पिपराही के छठ घाट पर देख लीजिए क्या राजा रंक फकीर सब एक समान देखने को मिलता हैं।
