कोशी लाइव/समस्तीपुर में पशु तस्करों ने एक पुलिस अधिकारी की गोली मारकर हत्या कर दी, जिसके बाद बिहार में कानून-व्यवस्था को लेकर फिर सवाल उठने लगे हैं.
बिहार में महागठबंधन की सरकार बनने के बाद नीतीश कुमार ने बहुत उम्मीद के साथ आरएस भट्टी को बीएसएफ़ से लाकर पुलिस फोर्स की कमान दी थी. ऐसा लगा था कि भट्टी अपराधियों की नकेल कसने में कामयाब हो जाएंगे. उनका एक बयान आज भी याद आता है, जब उन्होंने बिहार पुलिस के अपने मातहतों को संबोधित करते हुए कहा था कि आप अपराधियों को भगाइए नहीं तो वो आपको भगाएंगे. लगता है आज उनकी बात सच साबित हो रही है, अपराधी पुलिस पर भारी पड़ रहे हैं.
बिहार में गवर्नेंस का मुद्दा हमेशा से चिंता का विषय रहा है. विकास के निचले पायदान पर खड़ा बिहार जब भी चार कदम आगे बढ़ने की सोचता है तो उसे पीछे खींचने के लिए कई ऐसी नकारात्मक शक्तियां सक्रिय हो जाती हैं. वर्ष 2022 के अगस्त महीने में जब राजद-समर्थित नीतीश सरकार ने कुर्सी संभाली, उम्मीद तो थी कि नीतीश बिहार की विकास यात्रा को उसी तन्मयता से आगे बढ़ाएंगे, लेकिन अंदरूनी सियासी खींचतान ने सरकार की निरंतरता को हमेशा भंग किया.
छवि से बाहर निकलने की कशमकश
कभी जंगलराज का पर्याय बन चुका बिहार अपने इस कलुषित छवि को उतार फेंकने के लिए आतुर तो दिखता है, लेकिन व्यवस्था के अंदर की विद्रूपताएं बिहार को चारों तरफ से घेरे रहती हैं. दो दिन पहले समस्तीपुर जिले के मोहनपुर ठाणे के एसएचओ नंदकिशोर यादव को पशु तस्करों ने गोली मार दी, इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. पिछले महीने पटना के एसएसपी राजीव मिश्रा ने माना कि पटना में हर दिन औसतन एक हत्या हो रही है, किसी किसी दिन दो तीन भी. हर दिन बिहार के अलग-अलग जिलों से हत्या, लूट, तस्करी और पुलिस पर हमलों की खबर आती हैं लेकिन ये घटनाएं अब इतनी आम हो गई हैं कि जनता भी इसे बिहार की नियति मान चुकी है. प्रश्न यह उठता है कि क्या बिहार में पुलिस का खौफ अपराधियों के बीच खत्म क्यों हो गया है?
पूर्व डीजीपी एसके भारद्वाज इस ट्रेंड को लेकर कहते हैं, ‘पुलिस मनोबल का फोर्स है. पुलिस मुक़ाबले से डरती नहीं परहेज करती है, उसे लगता है कि मुठभेड़ के बाद उसे प्रोटेक्ट न किया गया तो क्या होगा? पुलिस का मोराल अप हो तो पुलिस कुछ भी कर सकती है, कोई भी पुलिस कमजोर नहीं होती है.’ पिछले तीन दशकों की कानून व्यवस्था पर तो महाकाव्य लिखे जा सकते हैं, लेकिन आगे बढ़ने के लिए पुरानी कहानी को भूलना भी पड़ता है.
पुलिस का दावा और क्राइम के आंकड़े
बिहार ने अपने हिंसक अतीत को भूलकर एक नई पहचान को अपनाने की कोशिश की है, लेकिन बिहार इसमें बहुत सफल नहीं हो पाया है. अगर पिछले दो-तीन वर्षों की घटनाओं पर नजर डालें तो इससे किसी को भी चिंता हो सकती है. 2020 से लेकर 2021 तक पुलिस पर 340 बार अपराधियों ने हमले किए.2022 में इस संख्या में और वृद्धि देखने को मिली, एक वर्ष के अंदर ही पुलिस पर 450 से अधिक बार हमले हुए. इन हमलों को लेकर जितेंद्र सिंह गंगवार, एडीजे (मुख्यालय) कहते हैं कि हमने इस सिलसिले में 6000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया हैं.
गंगवार अपने रटे-रटाए बयान में कहते हैं कि ‘हम प्रिवेंटिव और प्रोएक्टिव पुलिसिंग पर फोकस करते हैं.’लेकिन हालिया घटनाओं से ऐसा नहीं प्रतीत हो रहा है. आखिर पुलिस पर हमला करने की अपराधी हिम्मत कैसे जुटा लेते हैं? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्वतन्त्रता दिवस समरोह में राज्य की जनता को भरोसा दिलाते हुए बताया कि हमने बेहतर पुलिसिंग के लिए इसे दो भागों में बांटा है. एक भाग कानून व्यवस्था और दूसरा अनुसंधान का पक्ष देखता है. अब न तो संसाधन की कमी है और न ही पुलिस फोर्स की, काम तो पुलिस को ही करना है.
विपक्ष उठा रहा सवालबिहार बीजेपी के अध्यक्ष सम्राट चौधरी पूछते हैं कि जब मुख्यमंत्री खुद गृह विभाग देखते हैं, तो वो सवाल किससे कर रहे हैं, फैसला तो नीतीश कुमार को ही करना है. बिहार में अपराधी, शराब माफिया, बालू माफिया खुलेआम घूम रहे हैं और पुलिस पर हमले कर रहे हैं. पुलिस अपराधियों को नहीं मार पा रही है, अब अपराधी ही पुलिस को मार रहे हैं. बिहार पुलिस का एक बड़ा हिस्सा शराबबंदी के काम में लगा है लेकिन वैसे लोगों की तादाद भी कम नहीं जो शराब की तस्करी में वारा-न्यारा कर रहे हैं. अवैध बालू खनन और शराब तस्करी से एक नया अपराधियों का वर्ग पैदा हुआ है, जिसे न तो कानून का भय है और ही न ही पकड़े जाने का डर. बिहार में नए निवेश और उद्योगों की स्थापना के लिए सुशासन बेहद ज़रूरी है, लेकिन जिस तरह से अपराधी पुलिस को भी भगा रहे हैं, उस स्थिति को तत्काल बदलने की ज़रूरत है.
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