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Thursday, August 13, 2020

मधेपुरा/पूर्व कुलपति के बढ़ाए गए कांट्रेक्ट पर राजभवन ने लगाया रोक, बीएनएमयू में फिर से होगा यूएमआइएस का टेंडर

मधेपुरा। बीएन मंडल विश्वविद्यालय में पूर्व कुलपति के निर्देश से कार्यरत यूएमआइएस कंपनी के कांट्रेक्ट पर ग्रहण लगाते हुए राजभवन ने नए सिरे से विवि को टेंडर करने के निर्देश दिया है।

राज्यपाल सचिवालय के अपर सचिव राम अनुग्रह नारायण सिंह ने पत्र में कहा है कि विवि कुलपति द्वारा 28 जुलाई को भेजे गए तथ्यों का अवलोकन कर कुलाधिपति ने यूएमएसआइ के संचालन को लेकर पुन: टेंडर करने की अनुमति दी है। इससे पहले राजभवन के निर्देश से छात्र संगठनों सहित विवि के सिडिकेट व सीनेट सदस्यों इसे सत्य की जीत बताया। इस बाबत सीनेट सदस्य सह अभाविप के रंजन यादव, माया के अध्यक्ष राहुल यादव, छात्र नेता सारंग तनय ने कहा लंबे संघर्ष के बाद अनियमितता पर रोक लगी है। बता दे कि यूएमआइएस के पूरे मामले की जांच के लिए कुलपति डॉ. ज्ञानंजय द्विवेदी को आवेदन दिया था। इसमें आरोप लगाया है कि यूएमआइएस का कांट्रेक्ट आइटीई कंपनी से किया गया है। इससे किसी दूसरे को पेटी कांटेक्ट दे दिया है। यूएमआइएस की वर्तमान कंपनी से किए गए कांटेक्ट पर साइन करने वाले पदाधिकारियों को भी नहीं दिया गया। सब कुछ विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. अवध किशोर राय व तत्कालीन प्रति कुलपति डॉ. फारूक अली ने गुपचुप तरीके से अपने आवास पर एक साजिश की तरह कांट्रेक्ट को अंजाम दिया। यूएमआइएस की वर्तमान कंपनी ने जिन कामों को नहीं किया है, उससे संबंधित राशि भी भुगतान कर दी गई है। एक करोड़ से अधिक की राशि का भुगतान कर दिया गया है।

कंपनी को तीन किश्तों में किया लगभग एक करोड़ 15 लाख रुपये भुगतान

यूएमआइएस के पूरे मामले की जांच के लिए सीनेट व सिडिकेट सहित विभिन्न संगठनों ने कुलपति डॉ. ज्ञानंजय द्विवेदी को आवेदन दिया था। इसमें साफ-साफ कहा गया कि यूएमआइएस कंपनी आइटीआइ लूट का अड्डा बन गया है। इससे विश्वविद्यालय की छवि खराब हो रही है। वर्तमान यूएमआईएस कंपनी आइटीआइ की पूरी कार्य-प्रणाली और उसमें तत्कालीन कुलपति डॉ. अवध किशोर राय एवं तत्कालीन प्रति कुलपति डॉ. फारूक अली की भूमिका की भी उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। आरोप लगाया गया की ऐसी आशंका है कि तत्कालीन कुलपति एवं तत्कालीन प्रति कुलपति ने भी इस मामले में बेजा आर्थिक लाभ लिया है। यूएमआइएस की वर्तमान कंपनी ने कांट्रेक्टर के हिसाब से काम नहीं किया, इसके बावजूद उसे तीन किश्तों में लगभग एक करोड़ पंद्रह लाख रूपये भुगतान कर दिया गया है। इसकी रिकवरी होनी चाहिए।