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दिल्ली का दंगा अपने देश वासियों के सामने हजारों सवाल खड़ा कर रहे हैं और अगर इन सवालों पर गौर नही किया गया तो शायद ही हिंदुस्तान वासी अपने आप को कभी माफ कर पाएंगे।ये बात साफ है कि किसी राज्य में चुनाव सर पर हो तो वहाँ ज्यादा ही राष्ट्रवाद गूँजने लगता हैं। इसी तरह पिछले तीन महीने से जिस तरह दिल्ली में अंगारे का बोए जा रहे थे उसका फसल तो उगना ही था एक ना एक दिन वो उगा भी ओर कुछ दरिंदे करीब 50 के साथ कितनों का जिंदगी को बर्बाद कर दिया।हमे यह समझना होगा कि किस तरह दिल्ली चुनाव में बयानवाजी हुआ और किस तरह कपिल मिश्रा अचानक हिंदुओं के स्वघोषित हित रक्षक बन बैठे,यही वो व्यकि हैं जिसको कहते हुए आप सभी सुना होगा कि हम ट्रंप के जाने का प्रतीक्षा कर रहे हैं उसके बाद रास्ते नही खुले तो हम नही रुकेंगे।यही वो मुकाम था जिसने उत्तर पूर्वी दिल्ली के विनाशकारी दंगे की पृष्ठभूमि तैयार की।यहाँ ताहिर हुसैन का भी जिक्र बहुत जरूरी हैं उनके यहाँ से जिस तरह का सामग्री मिला है वे दर्शाते हैं कि राजनेता ओर राजनीति कहाँ तक गिर चुकी हैं।क्या आप को नही लगता कि वारिस पठान के बयान ओर कपिल मिश्रा का बयान या गिरिराज सिंह का बयान।दिनों तीनों के बयानों ने सतह के भीतर सुलगते शोलों को हवा दी हैं?क्या आप को ये नही लगता कि ये सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं।सरकार इस मामले में असफल रही हैं ये बात भी समझना होगा कि सरकार को ऐसे तत्वों से सख्ती से निपटना था लेकिन नही निपट पाए ये बात भी समझना होगा।इस सब सवालों के बीच एक बड़ा सवाल हिंदुस्तान के उन तमाम लोगों से जो भारत को विश्व गुरु बनाता देख रहा हैं तो क्या ऐसे ऐसे कार्य करने से विश्व गुरु बन सकता हैं?क्या नेताओ के बरगलाने में आना जरूरी हैं क्या?क्या आप को गिरती अर्थव्यवस्था नजर नही आ रही?क्या आपको बेरोजगारी दर नजर नही आती हैं क्या? इसलिए अगर भारत को विश्व गुरु बनता देखना हैं तो गंगा जमुना तहजीब को जिंदा रखना जरूरी हैं इस बात से आप इनकार नही कर सकते हैं।इसलिए उन नेताओं के बहकावे में मत आइए,जो अपने फायदा के लिए आपस में लड़वा रहे हैं वो कोई भी हो उस से दूर रहिये।
दिनेश चौधरी, सुरजापुर, सुपौल
दिल्ली का दंगा अपने देश वासियों के सामने हजारों सवाल खड़ा कर रहे हैं और अगर इन सवालों पर गौर नही किया गया तो शायद ही हिंदुस्तान वासी अपने आप को कभी माफ कर पाएंगे।ये बात साफ है कि किसी राज्य में चुनाव सर पर हो तो वहाँ ज्यादा ही राष्ट्रवाद गूँजने लगता हैं। इसी तरह पिछले तीन महीने से जिस तरह दिल्ली में अंगारे का बोए जा रहे थे उसका फसल तो उगना ही था एक ना एक दिन वो उगा भी ओर कुछ दरिंदे करीब 50 के साथ कितनों का जिंदगी को बर्बाद कर दिया।हमे यह समझना होगा कि किस तरह दिल्ली चुनाव में बयानवाजी हुआ और किस तरह कपिल मिश्रा अचानक हिंदुओं के स्वघोषित हित रक्षक बन बैठे,यही वो व्यकि हैं जिसको कहते हुए आप सभी सुना होगा कि हम ट्रंप के जाने का प्रतीक्षा कर रहे हैं उसके बाद रास्ते नही खुले तो हम नही रुकेंगे।यही वो मुकाम था जिसने उत्तर पूर्वी दिल्ली के विनाशकारी दंगे की पृष्ठभूमि तैयार की।यहाँ ताहिर हुसैन का भी जिक्र बहुत जरूरी हैं उनके यहाँ से जिस तरह का सामग्री मिला है वे दर्शाते हैं कि राजनेता ओर राजनीति कहाँ तक गिर चुकी हैं।क्या आप को नही लगता कि वारिस पठान के बयान ओर कपिल मिश्रा का बयान या गिरिराज सिंह का बयान।दिनों तीनों के बयानों ने सतह के भीतर सुलगते शोलों को हवा दी हैं?क्या आप को ये नही लगता कि ये सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं।सरकार इस मामले में असफल रही हैं ये बात भी समझना होगा कि सरकार को ऐसे तत्वों से सख्ती से निपटना था लेकिन नही निपट पाए ये बात भी समझना होगा।इस सब सवालों के बीच एक बड़ा सवाल हिंदुस्तान के उन तमाम लोगों से जो भारत को विश्व गुरु बनाता देख रहा हैं तो क्या ऐसे ऐसे कार्य करने से विश्व गुरु बन सकता हैं?क्या नेताओ के बरगलाने में आना जरूरी हैं क्या?क्या आप को गिरती अर्थव्यवस्था नजर नही आ रही?क्या आपको बेरोजगारी दर नजर नही आती हैं क्या? इसलिए अगर भारत को विश्व गुरु बनता देखना हैं तो गंगा जमुना तहजीब को जिंदा रखना जरूरी हैं इस बात से आप इनकार नही कर सकते हैं।इसलिए उन नेताओं के बहकावे में मत आइए,जो अपने फायदा के लिए आपस में लड़वा रहे हैं वो कोई भी हो उस से दूर रहिये।
दिनेश चौधरी, सुरजापुर, सुपौल
