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Friday, February 28, 2020

BIHAR NEWS:बिहार के लिए “पप्पू यादव” ही क्यों ?

कोशी लाइव_नई सोच नई खबर।
राहुल कुमार की रिपोर्ट।

इसी वर्ष बिहार विधानसभा चुनाव होने वाल है, अतः लोकतंत्र की गेंद पूरी तरह से जनता के पाले में आ चुकी है । वैसे तो आदर्श लोकतंत्र में - पुरे पाँच वर्ष तक गेंद जनता के पास ही रहनी चाहिए परंतु चुनाव के वक़्त तो जनता अंपायर बन जाती है । किसी भी खेल में ‘अंपायर’ वो मानक होता है जो उस खेल को न्याय के आधार पर संतुलन देते हुए आगे ले जाता हो । लोकतंत्र के इस जीवंत खेल में जनता ही सबसे बड़ा अंपायर है जो राजनीति के धुरंधर बलेबाज़ों पर अपनी पैनी नज़र रखता है और उसके राजनैतिक सफ़र को कहीं भी अंत कर देने की योग्यता रखता है । 

      आज बिहार की जनता को “अंपायर” बन कर बड़े और महत्वपूर्ण निर्णय लेने होंगे । कब तक-आख़िर कब तक, वही जात-पात, धर्म-सम्प्रदाय, मंदिर-मस्जिद और ख़ानदानी राजनीति को अपने कंधे पर ढ़ोती रहेगी बिहार की जनता । ए॰पी॰जी कलाम साहब के विज़न 2020 को हक़ीक़त में बदलने के लिए बिहार की जनता को अपना नेतृत्व-कर्ता चुनना होगा । एक ऐसा लीडर जो जात-पात और संघवाद के समीकरण से ऊपर उठ कर काम और सिर्फ़ काम को अपना धर्म मानता हो । जो, सड़क पर जनता के साथ संघर्ष करे और जनता की समस्या को सदन तक ले कर जाए । जिसके पास समाजिक बदलाव का न केवल खाका (ब्लू-प्रिंट) हो बल्कि उसे पूर करने के लिए अच्छी नियत भी हो । 

बिहार में जय-प्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति को सामजिक और राजनैतिक नज़रिए से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है । जनता इस आंदोलन को जिस भी नज़र से देखे मगर आपको पता होगा कि इस आंदोलन की नीव गुजरात में पड़ी थी और कारण था - होस्टल में भोजन की क़ीमत अचानक से बढ़ जाना । पुरे बिहार में इस आंदोलन को छात्रों ने ही जन-आंदोलन बनाया । इस आंदोलन से जुड़े कई छात्र नेता मुख्य-धारा के बड़े नेता बन कर उभरे । छात्र के मुद्दों की बात करने वाले ऐसे नेता ने छात्र-रजनीति का कितना सर्व-नाश किया है इसे बतलाने के लिए शब्दों की ज़रूरत नही ।  

1990 – 2020 (बिहार के 30 महत्वपूर्ण वर्ष)

छात्र राजनीति से उभरे नेताओं ने सबसे पहले विश्विद्यालय में ‘छात्र-चुनाव’ बंद करवा दिया क्यूँकि आने वाले 20 से 30 वर्षों तक इनके लूट पर कोई प्रशन उठाने वाला सामने नही आए । लालू जी के काल में JNU के एक बिहारी छात्र “चंद्र्शेखर” ने जब बिहार की दुर्दशा पर सवाल उठाना शुरू किया तो उन्हें बिहार के सत्ताधीशों ने दिन के उजाले में गोलियों की माला पहना दिया । लालू जी के 15 साल के शासन काल को “जंगल-राज” की संज्ञा देते हुए जिस नीतीश-कुमार ने सन 2005 में बिहार की कुर्सी पर क़ब्ज़ा किया था, उनके 15 साल पुरे हो चुके है ।
बिहार का हर युवा जिसकी उम्र 25 से 35 साल है उसने राजनैतिक होश सम्भालते ही नीतीश कुमार को बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में देखा है । उसने इन 15 सालों में बिहार की दुर्गति देखी है, पटना की सड़कों पर नाली और गटर का पानी देखा, चमकी-बुख़ार से बच्चों की मौत देखा, मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह-कांड में मासूम बच्चियों का योण शोषण देखा है । प्रदेश की एक-एक जनता जान चुकी है कि - 15 साल में सड़क, पुल और भवन का निर्माण कर देने को बिहार का विकास नही कहते हैं । “मगध-विश्विद्यालय” से काट कर “पतलिपुत्र -विश्विद्यालय”, तिलका-माँझी विश्विद्यालय” से काट कर “मुंगेर विश्विद्यालय” का निर्माण करने को “नए विश्विद्यालय” का निर्माण नही कहा जा सकता है । अख़बारों और प्रेस के माध्यम से ‘स्व-प्रचार’ को ‘सुशासन’ नही कहा जा सकता है । 

30 साल के “जंगल-राज” और “भ्रष्टाचार-राज” से मुक्ति पाने के लिए बिहार की जनता को इस विधान-सभा में एक ऐसे विकल्प को चुनना होगा जो विकास के वास्तविक स्वरूप को ज़मीनी स्तर पर लागू करने के लिए तैयार हो । ऐसा नेता जो जनता के सुख-दुःख में उनके साथ खड़ा रहे । जाति-धर्म की राजनीति से उठ कर ग़रीबी, रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ, पर्यावरण, स्वच्छता, विधि-व्यवस्था, यातायात की सुविधा, नगरीकरण, जैसे मुद्दों पर अपना ध्यान दें । लोगों के जीवन-स्तर को बेहतर करने का प्रयास करे और बिहार के लोगों के पलयान को रोकने की व्यवस्था करे । 

बिहार में बीते पाँच वर्षों में अधिकारिक रूप से विपक्ष की ज़िम्मेदारी पहले भाजपा और फिर राजद के हाथ में रही । मगर ये ज़िम्मेदारी विधान-सभा के सदन तक ही समिति नज़र आती है । सड़क पर अगर कोई विपक्ष की ज़िम्मेदारी को पिछले पाँच वर्षों से संभाल रहा है, जनता के हर एक समस्याओं को लेकर गम्भीरता से आवाज़ उठा रहा है तो वो “जन अधिकार पार्टी” और उसके संस्थापक राजेश रंजन उर्फ़ “पप्पू-यादव” है । 

छात्रों के परीक्षा-परिणाम का घोटाला हो या प्रदेश में स्वास्थ सेवा को लेकर समस्या हो । हर ज़मीनी मुद्दे पर जनता के साथ एक ही नेता नज़र आता है - “पप्पू-यादव” । निजी रूप से आप “पप्पू-यादव” से आप सहमत हो या असहमत मगर उनके काम, मेहनत और नियत पर सत्ता से लेकर विपक्ष तक कोई प्रशन चिन्ह नही उठा पाता है ।  

मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह-कांड के दोषियों को सज़ा दिलाने के लिए सबसे पहले सदन में आवाज़ उठाने वाला और बिहार का यही नेता है । उन मासूम बच्चियों को जल्दी इंसाफ़ मिल सके इसलिए सदन से बाहर निकल कर सड़क पर मधुबनी के बासो-पट्टी से पटना तक पैदल यात्रा करना । बिहार में चमकी बुख़ार से मरने वाले मासूम बच्चे की चीख़ को गूँगी-बहरी राज्य सरकार सुने इसके लिए पप्पू-यादव अपने एक-एक कार्यकर्ता के साथ सड़क पर उतर गए । 

हर-घर जल योजना की अपार विफलता का सबूत देते हुए प्रदेश के मुखिया “नीतीश कुमार” ने पटना के एक-एक घर में गटर और नाले का पानी पहुँचवा दिया । पटना शहर की ऐसी दयनीय हालत पिछले कई दशकों में नही हुई थी । “जल-कर्फ़्यू” की ऐसी भयावह स्थित जहाँ लोगों को खाने के लिए रोटी नही, नवजात बच्चों के लिए दूध नही, यातायात व्यवस्था ठप, लोग अपने ही घरों में क़ैदी बनने को मजबूर हो गए । ऐसी विषम-परिस्थिति में पप्पू यादव और उनके पार्टी के एक-एक कार्यकर्ता कमर भर पानी में उतर कर दिन रात लोगों के लिए खाना-पानी, बिस्किट-दूध, कैंडल-माचिस, यहाँ तक कि होस्टल में रही छात्राओं और     महिलाओं के लिए “सेनेटरी नेपकिन” तक उपलब्ध करवाया । गटर और नाले से निकले पानी में कमर तक उतर-कर पप्पू-यादव खुद जनता के बीच खाना और पानी ले कर गली-गली घूम रहे थे । इस भयानक स्थिति से जूझने के बाद पटना शहर की गंदगी को अपने हाथो से साफ़ करने वाले इस नेता के कार्यों को बिहार की जनता कैसे भूल सकती है ? 

आज गेंद बिहार की जनता के पाले में है, आज जनता “अंपायर” की भूमिका में है । इस बार बिहार की जनता को अपना बेशक़ीमती वोट देने से पहले सोचना होगा कि - चमकी बुख़ार से मारने वाले बच्चे ही कल के कलाम साहब और सचिन बन सकते थे, बालिका गृह में जिन बच्चियों के साथ योण शोषण करके मानवता को शर्मसार किया गया है वो बच्चियाँ कल की हिमा दास और सानिया मिर्ज़ा बन सकती थी । क्या ये बच्चियाँ और बच्चे हमारे अपने घरों से होते तभी हम सरकार से सवाल करेंगे? जब राज्य की राजधानी नाली और गटर के पानी से बर्बाद हो सकती है तो बिहार के अन्य ज़िलों के बारे में क्या कहा जा सकता है ? 

बिहार को एक ऐसे नेता की ज़रूरत है जो जात-पात का गठजोड़ न करे, जो जनता के सहयोग से पहले उसकी जाति और धर्म न पूछे । बिहार की ज़िम्मेदारी उस नेता के हाथ में देना होगा जो दिन-रात जनता के बीच रह कर उनके सुख-दुःख में शामिल होता हो न कि मुख्यमंत्री भवन से केवल आदेश जारी करता हो । 

ये लोकतंत्र है साहब, यहाँ तानाशाही नही चलेगी । बिहार की जनता इस बात को अच्छे से जानती है और इस चुनाव में जनता बदलाव करेगी - अपने लिए, अपने सपनों के लिए और बदलते बिहार के लिए ।