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अक्की।
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सहरसा। लोकसभा चुनाव में एकजुट दिखने वाला महागठबंधन इसबार सिमरी बख्तियारपुर के उपचुनाव में पूरी तरह से बिखरा हुआ नजर आ रहा है। जबकि महागठबंधन में शामिल राजद के अलावा वीआइपी ने यहां से अपने प्रत्याशी के नाम की घोषणा कर दी है। वहींवीआइपी को हम और रालोसपा का समर्थन मिलता दिख रहा है। किंतु कांग्रेस ने अबतक पत्ता नहीं खोला है। ऐसे में राजद को सिर्फ लोजद से ही कुछ आस दिख रही है।
बताते चलें कि जिले के चार विधानसभा क्षेत्रों में से एक सिमरी बख्तियारपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक दिनेशचंद्र यादव अब मधेपुरा से जदयू के सांसद हैं। मगर खगड़िया लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत यह विधानसभा क्षेत्र आता है। सीट खाली होने के बावजूद एनडीए ने यहां से पूर्व विधायक अरुण कुमार को मैदान में उतारा है। लेकिन महागठबंधन में पेंच फंसा हुआ है। टिकट की चाह में वैसे तो कई नेता थे। परंतु राजद ने पार्टी के वर्तमान जिलाध्यक्ष और जिला परिषद सदस्य मो. जफर आलम को मैदान में उतारा है। राजद प्रत्याशी इससे पूर्व दो बार यहां से भाग्य आजमा चुके हैं। जबकि महागठबंधन में शामिल विकासशील इंसान पार्टी ने यहां से दिनेश निषाद को प्रत्याशी घोषित कर दिया है। पार्टी प्रत्याशी के समर्थन में आयोजित सभा में वीआइपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सन ऑफ मल्लाह मुकेश सहनी ने स्पष्ट कर दिया कि लड़ाई एनडीए से है। परंतु राजद से दोस्ताना संघर्ष होगा। उनका कहना है कि खगड़िया लोकसभा की सीट पर लोकसभा चुनाव वीआइपी ने लड़ा था जिस कारण विधानसभा उपचुनाव में उनकी प्रबल दावेदारी थी। इसको लेकर शीर्ष नेतृत्व से बात भी हो चुकी थी। परंतु राजद ने यहां से प्रत्याशी दे दिया। वीआइपी के सभा में हम के जिलाध्यक्ष रामरतन ऋषिदेव की मौजूदगी से यह स्पष्ट हो गया कि हम उसके साथ है। जबकि रालोसपा नेता शिवेन्द्र सिंह जीशू कहते हैं कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्देश पर रालोसपा उपचुनाव में वीआइपी के प्रत्याशी को मदद करेगी। यानि यह तो साफ हो गया कि महागठबंधन में शामिल कांग्रेस को छोड़कर लगभग सभी दल ने अपनी राय दे दी है। वैसे, राजद प्रत्याशी के समर्थन में लोजद नेता रितेश रंजन मैदान में कूद गये हैं। महाबगठबंधन से टिकट की चाह इन्हें भी थी। लेकिन जब टिकट नहीं मिला तो राजद प्रत्याशी के साथ हो गये। सबसे अहम बात है कि एनडीए यहां पूरी तरह से एकजुट दिख रही है। एनडीए प्रत्याशी के नामांकन में भाजपा, लोजपा नेताओं की उपस्थिति देखी गई थी। राजनीतिक प्रेक्षकों की मानें तो विधानसभा का फाइनल चुनाव 2020 में होना है। लेकिन सेमीफाइनल में ही महागठबंधन के बिखराव का लाभ दूसरे दल को मिल सकता है। अब देखना है कि नामांकन व नाम वापसी तक यह बिखराव बना रहता है या महागठबंधन एकजुट हो सकती है।
