मुजफ्फरपुर के सदर अस्पताल (मॉडल अस्पताल) से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था और दिव्यांग सुविधाओं के दावों की हकीकत उजागर कर दी है। यह दृश्य संवेदनाओं को झकझोर देने वाला था, जहां ट्रेन हादसे में अपने दोनों पैर गंवा चुके एक दिव्यांग व्यक्ति को अस्पताल के मुख्य द्वार पर ही रोक दिया गया।
मामला औराई प्रखंड के साहपुर पितोझिया निवासी विनोद साह का है। विनोद साह ट्रेन हादसे में अपने दोनों पैर गंवा चुके हैं। मंगलवार को वह अपना यूडीआईडी (Unique Disability ID) कार्ड बनवाने के लिए सदर अस्पताल पहुंचे थे। लेकिन अस्पताल पहुंचने का उनका संघर्ष ही अपने आप में दर्दनाक था। दोनों पैर न होने के कारण वह खटिया लदी जुगाड़ गाड़ी पर लेटकर किसी तरह अस्पताल तक पहुंचे।
हैरानी की बात यह रही कि अस्पताल के मुख्य द्वार पर तैनात सुरक्षा गार्ड ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। गेट पर बेबस पड़े विनोद साह को देखकर अस्पताल परिसर में मौजूद मरीजों और परिजनों की भीड़ जुट गई। उद्घाटन शिलापट्ट के सामने खटिया पर लेटे विनोद की हालत देखकर हर कोई भावुक हो उठा।
इसी दौरान मौके पर मौजूद फोटो जर्नलिस्ट दीपक ने मानवीय संवेदनशीलता का परिचय दिया। उन्होंने विनोद साह का पुर्जा और आवश्यक दस्तावेज लेकर डॉक्टर तक पहुंचाया तथा मरीज की स्थिति से अवगत कराया। इसके बाद डॉक्टर ज्ञानेंदु शेखर ने अपने चैंबर के पीछे की खिड़की से झांककर विनोद का मुआयना किया और आवश्यक कागजी प्रक्रिया पूरी कराई।
विनोद साह ने बताया कि उनके परिवार में कोई मजबूत सहारा नहीं है। मजबूरी में उन्हें खुद ही जुगाड़ गाड़ी का सहारा लेकर अस्पताल तक आना पड़ा। उन्होंने उम्मीद की थी कि अस्पताल में दिव्यांगों के लिए विशेष व्यवस्था मिलेगी, लेकिन हकीकत बिल्कुल उलट निकली।
अस्पताल प्रशासन अक्सर दिव्यांगों के लिए रैंप, व्हीलचेयर और प्राथमिकता आधारित सेवाओं के बड़े-बड़े दावे करता है। लेकिन विनोद साह की यह तस्वीर उन सभी दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। सवाल यह है कि जब जरूरतमंद व्यक्ति अस्पताल के गेट तक पहुंच चुका था, तब उसे बुनियादी मदद क्यों नहीं मिली?
यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की परेशानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की विफलता की कहानी है, जो कागजों पर तो संवेदनशील दिखती है, लेकिन जमीनी स्तर पर कई बार असली जरूरतमंदों तक पहुंचने में नाकाम साबित होती है।